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Showing posts from June, 2017

सपनों की बातें

एक दिन बैठा था मैं छत पे कहने लगा चमकता चाँद, किसकी यादों में खोये हो तुम कैसे स्वप्न सजाते हो? आधी रात बीत गयी जाकर, क्यों नही तुम सो जाते हो? मैंने कहा: नींद मेरी तुझ जैसे ने ही चुरा लिया, मै भी अब तक सो जाता था, उसकी यादों ने जगा दिया। जब कभी भी मेरी आँख लगे उसके ही सपने आते हैं, जब जगता हूँ तो ना जाने वो दृश्य कहाँ खो जाते हैं। फिर कहता हूँ की कौन है वो? उसका मुझसे क्या नाता है, क्या जुड़ा है मेरे जीवन से जो कुछ सपने में आता है? आखिर वो मुझको ऐसे क्यों पल पल यूँ ही तड़पाता है, मैं तो कुछ समझ नही पाता, न वो स्पष्ट बताता है। या शायद मेरा उसका कोई पूर्व जन्म का नाता है, डरता है वो किसी बात से या शायद घबराता है। जब कभी पूछना चाहूँ तो ये होंठ मेरे सिल जाते है, इस बात से नही की डरता हूँ ये सोचने मैं लग जाता हूँ, आखिर तू ऐसी चीज कहा क्यों धोखे में आ जाता हूँ?
काफ़िरो का शहर है, जरा इश्क़ का आगाज़ होने दो, इधर तो शोर काफी है, थोड़ा उधर भी आवाज़ होने दो।