Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2017

अपराधी

मत रंगों मेरे सपनों को, इन्हें उजला ही रहने दो। कल के तुम फिर चले गए तो? रंग सब फीके पड़ जायेंगे। कोयल की कूक, बंसी की धुन, झरने का संगीत, सागर के गीत, सब तीखे पड़ जायेंगे। स्वार्थ हो गया न तुम्हारा, पता है अब तुम नही रुकोगेे। फिर मेरे चादर की सिलवटें बढ़ जाएँगी, चाँदनी मुझ पर अलग ही रौब दिखायेगी, सितारे भी तानें मारेंगे "लो तुम्हारा चाँद तुम्हे फिर छोड़ गया", मैं एक अपराधी सा सब कुछ सह लूंगा, चछु सागर फिर बहेगा एकांत की ओर, पकड़ के एक लहर उसकी मैं भी साथ में बह लूंगा।

समंदर और मैं

ऐ समंदर, कितना शुकून है तुझ में मैं समझ नहीं पाता, कुछ तुझ सा ही है मेरा मन भी मगर बड़ा ही चंचल है । रोज कितनी नावें चलती है इसमें, कुछ डूब जाती है, कुछ उबर जाती है। लेकिन तू तो क्या गज़ब का आलिम है, जब भी छु लेता हूँ तेरी मौजों को, मैं सभ कुछ जान लेता हूँ, जो नाव संभलते संभलते कही मेरे अंदर ही डूब गयी उसे भुला, जो संभलने की फिराक में है उसको ही अपना मान लेता हूँ।