मत रंगों मेरे सपनों को, इन्हें उजला ही रहने दो।
कल के तुम फिर चले गए तो?
रंग सब फीके पड़ जायेंगे।
कोयल की कूक,
बंसी की धुन,
झरने का संगीत,
सागर के गीत,
सब तीखे पड़ जायेंगे।
स्वार्थ हो गया न तुम्हारा,
पता है अब तुम नही रुकोगेे।
फिर मेरे चादर की सिलवटें बढ़ जाएँगी,
चाँदनी मुझ पर अलग ही रौब दिखायेगी,
सितारे भी तानें मारेंगे "लो तुम्हारा चाँद तुम्हे फिर छोड़ गया",
मैं एक अपराधी सा सब कुछ सह लूंगा,
चछु सागर फिर बहेगा एकांत की ओर,
पकड़ के एक लहर उसकी मैं भी साथ में बह लूंगा।
कल के तुम फिर चले गए तो?
रंग सब फीके पड़ जायेंगे।
कोयल की कूक,
बंसी की धुन,
झरने का संगीत,
सागर के गीत,
सब तीखे पड़ जायेंगे।
स्वार्थ हो गया न तुम्हारा,
पता है अब तुम नही रुकोगेे।
फिर मेरे चादर की सिलवटें बढ़ जाएँगी,
चाँदनी मुझ पर अलग ही रौब दिखायेगी,
सितारे भी तानें मारेंगे "लो तुम्हारा चाँद तुम्हे फिर छोड़ गया",
मैं एक अपराधी सा सब कुछ सह लूंगा,
चछु सागर फिर बहेगा एकांत की ओर,
पकड़ के एक लहर उसकी मैं भी साथ में बह लूंगा।
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