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तिल

ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो,
बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो।

क़ातिल निगाहें आगाज़ भी करती हैं, रुलाती भी हैं,
हुक़ूमत तुम्हारी है, ये कैसे हुक्मरान बनाये रक्खे हो।

ख़ता तुम्हारी, और तुम्हारे हक़ में फैसला भी,
बेमुरौवात हो, मज़नुओं का क्या हाल बनाये रख्खे हो।

इक अर्से से अर्जि है की मेरे हिस्से में मिलो तुम,
अदालत तुम्हारी है, जाने कहा मेरे दरख़्वास्त दबाये रख्खे हो।

तक़रीर-ए-हुस्न में एक क़िताब हो जाये,
लब ग़ुलाब, रुख़ चाँद सा...
और केशुओं को आसमान बनाये रख्खे हो।

ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो।
बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो।

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