बरखा की नवल बूँद, कोयल की मृदुल कूक, सावन का काम रूप देख, मैं मोहित हो जाता हूँ, सम्मोहित हो जाता हूँ, बेबस सा पिछली यादों में मैं खिंचा चला जाता हूँ। वो बूँद जो माथे को छु कर वछ से नाभि तक जाती है, वो प्रथम मिलन का मन्त्रमुग्द आलिंगन याद दिलाती है, फिर पुरवाई अधरों को छूकर मन्द मन्द मुस्काती है, जो अमलतास के पत्तों से झर झर के बुँदे आती हैं, वो बून्द नही सब मोती है, मेरी आँखे है, रोती हैं। वो पुरवाई कोई और नहीं, बस तुम ही हो कोई और नहीं। ... एक आह्वाहन है बरखा से, इस बार जरा एहसान करो, मैं ना जानू वो कहाँ गया, तुम सुनो मेरा एक काम करो, कुछ आँसू लो मेरे आँखों से, वो जहां दिखे बरसा देना, था चाँद क्यों अम्बर भूल गया? उसे मेरी तलब लगा देना।