शहर के शोर में कहीं ग़ुम हो गयी है दोस्ती,
चलो फिर गाँव चलें,
पीपल के छावँ चलें,
तुम बनाओ एक कागज़ की नाव, मैं बस्ते में सपनों को भरता हूँ,
उतार कर बरखा में नाव, चलो धरती के उस पार चलें,
चलो फिर गाँव चलें।
चलो फिर गाँव चलें,
पीपल के छावँ चलें,
तुम बनाओ एक कागज़ की नाव, मैं बस्ते में सपनों को भरता हूँ,
उतार कर बरखा में नाव, चलो धरती के उस पार चलें,
चलो फिर गाँव चलें।
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