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Showing posts from July, 2017

आँसू मेरे

क्यूँ आते हो फिर सपनों में , क्या हक़ है मुझे रुलाने का? ये आँसू ही हैं धन मेरा , ये आँसू ही साथी मेरे... क्या इन्हे भी ले लोगे मुझसे? . लेना है तो ले जाओ ना इन सोनी सोनी यादों को, हर रोज संभाले रक्खा हूँ जिनको तकिये के नीचे मैं, लेना है तो ले जाओ ना उन कसमों को उन वादों को, हर रोज संभाले रक्खा हूँ जिन्हें चादर की सिलवटों में, पर नयन नीर मेरे रहने दो, है पीर मेरे , मेरे रहने दो, . सब पथ में मैं एकाकी हूँ, ये आँसू ही हमराह मेरे, ये आँसू ही हैं धन मेरा , ये आँसू ही साथी मेरे..।

तिल

ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो, बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो। क़ातिल निगाहें आगाज़ भी करती हैं, रुलाती भी हैं, हुक़ूमत तुम्हारी है, ये कैसे हुक्मरान बनाये रक्खे हो। ख़ता तुम्हारी, और तुम्हारे हक़ में फैसला भी, बेमुरौवात हो, मज़नुओं का क्या हाल बनाये रख्खे हो। इक अर्से से अर्जि है की मेरे हिस्से में मिलो तुम, अदालत तुम्हारी है, जाने कहा मेरे दरख़्वास्त दबाये रख्खे हो। तक़रीर-ए-हुस्न में एक क़िताब हो जाये, लब ग़ुलाब, रुख़ चाँद सा... और केशुओं को आसमान बनाये रख्खे हो। ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो। बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो।

बरखा

बरखा की नवल बूँद, कोयल की मृदुल कूक, सावन का काम रूप देख, मैं मोहित हो जाता हूँ, सम्मोहित हो जाता हूँ, बेबस सा पिछली यादों में मैं खिंचा चला जाता हूँ। वो बूँद जो माथे को छु कर वछ से नाभि तक जाती है, वो प्रथम मिलन का मन्त्रमुग्द आलिंगन याद दिलाती है, फिर पुरवाई अधरों को छूकर मन्द मन्द मुस्काती है, जो अमलतास के पत्तों से झर झर के बुँदे आती हैं, वो बून्द नही सब मोती है, मेरी आँखे है, रोती हैं। वो पुरवाई कोई और नहीं, बस तुम ही हो कोई और नहीं। ... एक आह्वाहन है बरखा से, इस बार जरा एहसान करो, मैं ना जानू वो कहाँ गया, तुम सुनो मेरा एक काम करो, कुछ आँसू लो मेरे आँखों से, वो जहां दिखे बरसा देना, था चाँद क्यों अम्बर भूल गया? उसे मेरी तलब लगा देना।