ऐ समंदर, कितना शुकून है तुझ में
मैं समझ नहीं पाता,
कुछ तुझ सा ही है मेरा मन भी मगर बड़ा ही चंचल है ।
रोज कितनी नावें चलती है इसमें,
कुछ डूब जाती है, कुछ उबर जाती है।
लेकिन तू तो क्या गज़ब का आलिम है,
जब भी छु लेता हूँ तेरी मौजों को, मैं सभ कुछ जान लेता हूँ,
जो नाव संभलते संभलते कही मेरे अंदर ही डूब गयी उसे भुला,
जो संभलने की फिराक में है उसको ही अपना मान लेता हूँ।
मैं समझ नहीं पाता,
कुछ तुझ सा ही है मेरा मन भी मगर बड़ा ही चंचल है ।
रोज कितनी नावें चलती है इसमें,
कुछ डूब जाती है, कुछ उबर जाती है।
लेकिन तू तो क्या गज़ब का आलिम है,
जब भी छु लेता हूँ तेरी मौजों को, मैं सभ कुछ जान लेता हूँ,
जो नाव संभलते संभलते कही मेरे अंदर ही डूब गयी उसे भुला,
जो संभलने की फिराक में है उसको ही अपना मान लेता हूँ।
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