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समंदर और मैं

ऐ समंदर, कितना शुकून है तुझ में
मैं समझ नहीं पाता,
कुछ तुझ सा ही है मेरा मन भी मगर बड़ा ही चंचल है ।
रोज कितनी नावें चलती है इसमें,
कुछ डूब जाती है, कुछ उबर जाती है।
लेकिन तू तो क्या गज़ब का आलिम है,
जब भी छु लेता हूँ तेरी मौजों को, मैं सभ कुछ जान लेता हूँ,
जो नाव संभलते संभलते कही मेरे अंदर ही डूब गयी उसे भुला,
जो संभलने की फिराक में है उसको ही अपना मान लेता हूँ।

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तिल

ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो, बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो। क़ातिल निगाहें आगाज़ भी करती हैं, रुलाती भी हैं, हुक़ूमत तुम्हारी है, ये कैसे हुक्मरान बनाये रक्खे हो। ख़ता तुम्हारी, और तुम्हारे हक़ में फैसला भी, बेमुरौवात हो, मज़नुओं का क्या हाल बनाये रख्खे हो। इक अर्से से अर्जि है की मेरे हिस्से में मिलो तुम, अदालत तुम्हारी है, जाने कहा मेरे दरख़्वास्त दबाये रख्खे हो। तक़रीर-ए-हुस्न में एक क़िताब हो जाये, लब ग़ुलाब, रुख़ चाँद सा... और केशुओं को आसमान बनाये रख्खे हो। ये जो तुम तिल को दरबान बनाये रख्खे हो। बशीरा सबको हैरान बनाये रख्खे हो।
काफ़िरो का शहर है, जरा इश्क़ का आगाज़ होने दो, इधर तो शोर काफी है, थोड़ा उधर भी आवाज़ होने दो।

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